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Tithiyan by Best Astrologer Sohan Lal SHASTRI

तिथियां


दोस्तों आज हम बात करेंगे ज्योतिष शास्त्र में तिथियों की
इन का बहुत सारा महत्व होता है हमारे ज्योतिष शास्त्र में, ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा की एक कला को तिथि माना जाता है|

और तिथियों की जो गणना होती है जो हिसाब होता है वह शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ होता है

अर्थात पहली तिथि से वह आरंभ हो जाती है

शुक्ल पक्ष

और अमावस्या के बाद की प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक की तिथियां शुक्ल पक्ष की और

पूर्णिमा के बाद की प्रतिपदा से आरंभ करके अमावस की तिथियां कृष्ण पक्ष की होती है

इस प्रकार 1 महीने में 2 पक्ष होते हैं एक शुक्ल पक्ष और दूसरा कृष्ण पक्ष शुक्ल पक्ष वह पक्ष होता है

जिसमें चंद्रमा उपस्थित रहता है

अर्थात उन रात्रियों में चंद्रमा दिखता है लेकिन कृष्ण पक्ष में जो रात्रि आती हैं

उन में चंद्रमा उपस्थित नहीं होता

कृष्ण पक्ष

इसलिए उनको कृष्ण पक्ष की तिथियां कहते हैं

इन दोनों पक्षों के पूर्णिमा और अमावस्या के अतिरिक्त अन्य तिथियों के नाम एक जैसे होते हैं

जैसे प्रतिपदा द्वितीय तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी अष्टमी नवमी दसवीं एकादशी द्वादशी त्रयोदशी चतुर्दशी पूर्णिमा और उसके बाद शुक्ल पक्ष की तिथि को पूर्णिमा की तिथि और कृष्ण पक्ष की तिथि को अमावस्या कहा जाता है|

123 अंको के रूप में लिखा जाता है|
पूर्णिमा तक यह क्रम 15 की सख्या तक चलता है | परन्तु उसके बाद फिर इसको १२३ के क्रम से लिखा जाता है|

तिथियों के देवता

जिस दिन अमावस्या होती है,उस दिन अमावस्या तिथि को ३० के क्रम मे लिखा जाता है |ज्योतिष शास्त्र में तिथियां दो तरह की होती हैं एक कृष्ण पक्ष की और दूसरी शुक्ल पक्ष की | कृष्ण पक्ष के तिथियों में आखिर में अमावस्या आती है जिसको ३० के रूप में भी लिखा जाता है और शुक्ल पक्ष की तिथियों में 15 दिनों के बाद पूर्णिमा की तिथि आती है जिसको 15 में लिखा जाता है बस यही तिथियों का फर्क होता है | कृष्ण पक्ष की तिथियों में अंधेरा रहता है और शुक्ल पक्ष में तिथियों में आकाश में प्रकाश रहता है | इसलिए इसको शुक्ल पक्ष कहा जाता है| इनकी जो तिथियां होती हैं उनके देवता भी होते हैं| इन तिथियों के हिसाब से ही इनके देवता का निर्णय होता है और उनकी पूजा भी होती है | जैसे प्रतिपदा तिथि जो की पहली तिथि है उसके देवता अग्निदेव हैं और द्वितीय तिथि जो है जिसको दूसरी तिथि कहते हैं | उनके देवता ब्रह्मा जी हैं| तृतीय तिथि जो की तिथि है इनके देवता माता गौरी हैं और चतुर्थी तिथि भगवान गणेश जी की है भगवान गणेश जी इनके देवता हैं पंचमी तिथि के देवता शेषनाग जी हैं और षष्ठी के देवता कार्तिकेय जी हैं छठी तिथि कार्तिकेय भगवान को समर्पित होती है | उसके बाद सप्तमी तिथि के देवता भगवान सूर्यदेव हैं | अष्टमी के भगवान शिव हैं| और नवमी के देवी माता दुर्गा है और दशमी के महाकाल हैं और एकादशी तिथि के विश्वदेवा देव हैं और द्वादशी तिथि के देवता भगवान विष्णु हैं और त्रयोदशी तिथि के कामदेव हैं और चतुर्दशी तिथि के देवता भगवान शिव हैं| पूर्णमासी के देवता चंद्रमा है और अमावस्या के देवता पितर हैं | इस तरह के दिन निर्धारण होते हैं| क्योंकि जो देवता होते हैं तिथि के हिसाब से उन देवताओं की पूजा होती है इस तरह तिथि का निर्धारण होता है तिथियों के शुभ और अशुभ का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उनके स्वामियों के संबंध में विचार किया जाता है | श्री रामजी

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