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Maha Shivratri Varth Katha

Maha Shivratri Varth Katha

maha shiv ratri varth kathaShiv puja

शिवरात्रि की व्रत कथा कब और कैसे करें जय हम आज आपको बताएंगे शिवरात्रि दो प्रकार की कही गई है
एक तो हर मास की शिवरात्रि जो की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को होती है और दूसरी जो फागुन मास में कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का व्रत माना गया है
एक बार सब देवताओं ने मिलकर शिव जी से प्रार्थना की
तब भगवान शिव ने कृपा करके इस पृथ्वी पर पापों का नाश करने वाली और मोक्ष देने वाली शिवरात्रि की व्रत को कहा
उसी दिन से जय शिवरात्रि का व्रत और उत्सव आरंभ हुआ महाशिवरात्रि व्रत सुब्रतो में उत्तम और पुराना है
इस व्रत को प्राचीन काल में ही राजा दिलीप राजा नल राजा नहुष मांधाता सगर और राजा हरिश्चंद्र हरिश्चंद्र आदि ने भी किया है पुराणों में ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि अरुंधती सीता सावित्री सरस्वती एवं गायत्री आधी सदी महिलाओं ने भी शिवरात्रि का व्रत और अनुष्ठान किया था इसलिए महाशिवरात्रि व्रत के दिन विधि से पूजन और कथा करनी चाहिए
इसके पूजन की विधि महाशिवरात्रि का व्रत जो लोग प्रति मास शिवरात्रि व्रत का पालन नहीं कर सके तो वह साल में एक बार महाशिवरात्रि का व्रत विधि पूर्ण कर लें
तो उन्हें 12 महीने की शिवरात्रि का फल प्राप्त हो जाता है चारों वर्णों के और चारों जातियों के लोगों और स्त्री पुरुष सब इस व्रत को करने के अधिकारी हैं
महाशिवरात्रि के दिन प्रातः काल उठकर सर्वप्रथम शिव जी का ध्यान करें
उसके पश्चात नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नान करें रुद्राक्ष की माला धारण करके भगवान शिव का ध्यान करें
और उसके बाद रुद्रा अष्टाध्याई के वैदिक मंत्र शिव के हजार नाम शिव की महिमा स्तोत्र और शिव चालीसा का शुद्ध होकर पाठ करें औरओम नमः शिवाय इस मूल मंत्र का उच्चारण भी करें तो भी पर्याप्त है जितनी समर्थ और श्रद्धा हो उतना पाठ कर ले फिर धूप दीप नैवेद्य से पूजा करकेउस दिन व्रत रखे जो लोग व्रत ना रख सके वह कम से कम रात्रि का जागरण और शिव के नामों का जाप अवश्य करें वह साक्षात शिव रूप ही बन जाते हैंजो भगवान शिव का जागरण करते हैं शिवलिंग की बेल पत्र जल्द से पूजा करें शेष समय शिव के भजन एवं कीर्तन से ही और उनके ध्यान में समय व्यतीत करना चाहिए
महाशिवरात्रि की व्रत कथा
भगवान शिव की महिमा सुनकर ऋषिओं ने श्री सूत जी से पूछा, सूत जी आपकी अमृत जैसी वाणी सुनकर और आशुतोष भगवान शिव की महिमा सुनकरहम बड़े खुश हुए हैं हमें कोई शिवजी से संबंधित उत्तम व्रत की कथा कहें तब सूत जी ने कहा यह ऋषि गन आप लोग अच्छी तरह से सुनिए
मैं जहां एक ऐसी बहुत पुरानी कथा कह रहा हूं जो किसी समय नारद जी ने भगवान विष्णु से कही थी एक ऐसी अद्भुत कथा है
जो प्राणियों के समस्त पापों का नाश करने वाली है सहज ही उत्तम शिवरात्रि का विधान है उसको ध्यान से सुनिए, प्राचीन काल में गुरु ग्रह नाम का एक भील था
जो शिकारी का काम किया करता था वह भी क्रूर और बलवान था
प्रतिदिन जंगल में जाकर शिकार करता था और अपने परिवार का पालन पोषण करता था
और घोर वनों में छुपकर चोर डाकू का काम भी करता था किसी समय देव योग से सुंदर महाशिवरात्रि तिथि आ गई
परंतु उस दुरात्मा को क्या पता था वह अपने बुरे कर्मों में व्यस्त हो कर गौर जंगलों में मस्त रहा उसी शिवरात्रि वाले दिन उसकी माता पिता स्त्री ने भूख से तड़पते हुए कहा ,
हमें भोजन दो आज घर में कुछ भी नहीं है, बारंबार इस प्रकार प्रार्थना करने पर वह धनुष बान ले कर शीघ्र ही वन में पशु पक्षियों का शिकार करने के लिए निकल पड़ा ,
चारों ओर वन में घूमने पर भी उसे दुर्भाग्यवश कोइ शिकार नहीं मिल रहा था इसी प्रतीक्षा में संध्या हो चली जब सूर्य अस्त होने लगा तो वह बड़ा दुखी और चिंतित हो गया,
मन में सोचा कि मुझे आज भी शिकार ना मिला तो कहां जाऊं तो क्या करूंगा,शिकार को लेकर चलना ही चाहिए नहीं तो मेरा जीना ही व्यर्थ है
ऐसा सोच विचार कर के बाद किसी सरोवर पर गया और उसी रात वहां एक मृगी आ रही थी और आगे बढ़ते ही अकेली आ रही थी विष्णु जी कहते हैं कि हे नारद
उसे आता देखकर शिकारी बहुत खुश हुआ और उसे मारने के लिए अपने धनुष पर तीर चलाया तो अभी उसे भी मारना ही चाहता था इसी बीच संयोगवश उसके पात्र का जल और कुछ बिल पत्र नीचे को गिर गए उसके नीचे एक शिवलिंग पड़ा था
इस प्रकार अनजाने में ही शिवरात्रि के प्रथम समय की पूजा हो गई अर्थात उस पापी शिकारी द्वारा भी शिवलिंग पर जल और बिल के पत्ते चढ़ गए
उस पूजा के प्रताप से उस पापी के सभी पाप नष्ट हो गए उस समय जल के गिरने एवं पत्तियों के टकराने की आवाज सुनकर मृगी डरने लगी
और घबराकर उससे पूछने लगी कि है शिकारी तुम यहां क्या करना चाहते हो
मुझसे कहो मृगी की बात सुनकर शिकारी कहने लगा कर मेरा परिवार भूख प्यास से तड़प रहा है इसलिए तुझे मार कर संतुष्ट कर लूंगा
उसके ऐसे कठोर वचन सुनकर वह घबरा गई , अब मैं क्या करूं, कहां जाऊं, अब प्राण बचाने का कोई उपाय करना चाहिए,
ऐसा सोच विचार करके करेगी उस वह ब्याध से कहने लगी कि ब्याध तुझे सुख प्राप्त हो तो इससे बढ़कर महान पुण्य क्या हो सकता है
संसार में परोपकार से बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं है देखो उपकार करने वाले का जो पुण्य कहा गया है उस पुण्य का फल हजारों वर्षों में करने से समस्त नहीं हो सकता
एक प्रार्थना सुन लो मेरे स्थान मे मेरे बच्चे हैं वह अपनी बहन को सौंपकर तुम्हारे पास अवश्य आ जाऊंगी मेरा वचन को मिथ्या मत समझनामैं अवश्य ही अपना वचन पूरा करके आ जाऊंगी सूत जी कहते हैं कि है मुनियों इस प्रकार मिर्गी द्वारा समझाने पर शिकारी ने उसका वचन नहीं मानातब वे चकित होकर उस ने प्रतिज्ञा की कि अब और क्या कहूं तेरे पास ना आउ तो मुझे दोष लगे ऐसा दोष जो लोगों को लगता है, विश्वासघाती करने को जो पाप लगता है
वहीं पाप मुझे भी लगे, जल्दी में घर जाकर दोबारा ना आउ तो इस प्रकार अनेक प्रकार के द्वारा ब्याध को विश्वास दिलाया, तब उसने कहा अच्छा जाउ ,
वह सुनकर अपने स्थान को चली गई
तब तक उस शिकारी का समय बिना अन्न जल एवं नींद के बीत गया इसी बीच उस की दूसरी बहन मिर्गी भी जल पीने के लिए वहां आ पहुंचीउसे देखकर मैंने भी पहले से उसके ऊपर बांध छोड़ना चाहो तब पुनः उसके पत्थर से जलधारा तथा कुछ बिल्व पत्र उस शिवलिंग पर आ गिरे
उस समय पुनः प्रसंग से महाप्रभु शंकर की पूजा हो गई दूसरे याम की शिव पूजा शिकारी को सुख देने वाली सिद्ध हुई,
यह देखकर वह मुर्गी वह शिकारी से बोली के यह तुम क्या कर रहे हो बाद में पहले की तरह कहा, तब वह सुनकर मृगी बोली के है ब्याध
सुनो मैं धन्य हूं मेरी यह देह धारण करना सफल है क्योंकि मेरी इस अनित्य शरीर से कोई महान उपकार होगा परंतु मेरे छोटे-छोटे बच्चे, जो घर पर हैं
उन्हें मैं अपने गृह स्वामी पति को अर्पित करके पुनः अवश्य लौट आऊंगी यह सही जानो ,मुझे अब जाने दो,यह सुनकर शिकारी ने कहा मैं तुम्हारी बात नहीं मानता
तो मैं अवश्य मारूंगा, शिकारी की बात सुनकर है मृगी ने सौगंध खाकर फिर कहा कि यदि मैं ना आ सके तो मुझे वचन तोड़ने का पाप लगेगामुझसे मेरा पुण्य नष्ट होगा, जो विष्णु भगत होकर शिव की निंदा करता है उसे जो पाप लगता है वही मुझे लग जाए ,यदि मैं दोबारा ना आउ,
जो मानव माता-पिता की तिथि को पाकर श्राद्ध नहीं करते उनको जो पाप लगता है वह मुझे भी लगे, इस तरह सूत जी कहते हैं,
कि ऐसी बातें सुनकर शिकारी ने उसे भी जाने की अनुमति दे दी, अच्छा तुम जाओ तब मृगी भी जल पीकर प्रसन्न होती हुई अपने घर को चली गई
, तब तक रात्रि का दूसरा पहर भी उसका बिना जल पान के बीत गया मृगी के आने में देर होने लगी, तब व्याख्यान होकर उसकी खोज में तैयार हो गया,
इसी बीच उस शिकार की दृष्टि पानी पीने के लिए आते हुए एक मृग पर पड़ी, वह निषाद उसको देखकर अत्यंत प्रसन्न हो गया उसने धनुष पर बाण चलाकर उसे मारना चाहा,
उसी समय संयोग से शिवलिंग की पूजा सौभाग्य से हो गई यह बाबा शिव की कृपा थी
वहां पर उस शब्द को सुनकर मृग ने कहा, अरे यह तुम क्या कर रहे हो, तब उस शिकारी ने कहा कि अपने परिवार के पालन के लिए मैं तुम्हें मारना चाहता हूं
तब सूत जी ने कहा , शिकारी की बातें सुनकर वह प्यासा मृग चिंतित होकर उस ब्याध से इस प्रकार कहने लगा कि
मैं आज धन्य हूं कि मेरा जो शरीर संसार की तृप्ति के लिए होगा, क्योंकि जिसका शरीर परोपकार में ना लगा हो, उसका सारा जीवन व्यर्थ ही जाता है
इसलिए हे शिकारी , इस समय तुम मुझे छोड़ दो ,मैं अपने उन छोटे बच्चों को उनकी माता के हाथ में पर दे कर शीघ्र ही लौट आऊंगा,
उस मृग के निष्कपट भाव से ऐसा कहने पर वह ब्याध अपने मन में अत्यंत व्यथित होकर तत्काल पवित्र मन वाला हो गया, उसके सभी पाप नष्ट हो गए
,तब वह इस प्रकार कहने लगा कि इससे पहले भी जो भी आये , वह सभी तुम्हारे ही समान मुंह से कहकर, अभी तक दोबारा नहीं लौटे,
जितनी भारी प्रवचना है उन्हीं वचनों की बातें तुम भी इस संकट काल से जान बचाने के लिए झूठ बोल कर चले जाओगे, तब एक बार बताओ,
मेरी आजीविका कैसे चलेगी ,क्योंकि मेरे परिवार भी भूख प्यास से घर पर तड़पते होंगे अब तब मैं कैसे विश्वास करूं, यह सुनकर उस ने कहा की है मैं सत्य कहता हूं मिद्यावादी नहीं हूं, देखो हे भील , समस्त ब्रह्माण्ड सत्य के बल पर ही टिके हुए हैं क्योंकि इस संसार में जिसकी वाणी मिद्या होती है उसके सभी पुण्य तत्काल खत्म हो जाते हैं,जो लोग शिवजी की पूजा नहीं करते और जो बिना भोग लगाए आहार करते हैं, ऐसे पापियों का दोष मुझे लगेगा, सूत जी कहते हैं कि है मृग ने उससे भी कहा कि जल्दी लौट आना, यह सुनकर मृग ने वहां पानी पिया
और चल दिया,मृग ने अपने निवास पर सबसे कह सुनाया ,तब उन सभी लोगों ने आपस में विचार करके, एकमत होकर संगठित रूप से अपने स्थान पर ही प्रतिज्ञा कर ली कि सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है अतः हम लोगों को निश्चिंत ही वहा जाना चाहिए,तभी अपने बालकों को वही धैर्य प्रदान कर के, बाद के चलने को तैयार हो गए, उस मृग की कई पत्नियां थी ,उनसे जो सबसे बड़ी थी ,अपने स्वामी से कहा कि आप यहीं रह जाए, क्योंकि आपके बिना यह बच्चे कैसे रहे गे, दूसरी बात यह है
कि मैंने वहा सर्व प्रथम जाने का शपथ ग्रहण किया था, इस कारण मुझे वहां जाना चाहिए ,आप यही रहेगी, उनकी बात सुनकर छोटी मृगी बोली
,मैं भी वही जा रही हूं आप यही रहे ,उनकी विनती सुन कर कहा कि नहीं नहीं वहां मुझे भी जाना चाहिए, क्योंकि तुम दोनों यहीं पर रह जाओ,क्योंकि बच्चे की रक्षा का कार्य माता ही भली भांति कर सकती है, आपने स्वामी का वचन सुनकर, उन्होंने कहा, हे प्रभु ,यह भारतीय धर्म मर्यादा के विरुद्ध है ,की पत्नी के रहते, पहले पति मरे, क्योंकि बिना पति के स्त्रियों के जीवन को धिक्कार है ,हम सभी चलेंगे ,ऐसा विचार करके अपने बच्चों को देखकर,उन्हें अपने सहवासी किसी अन्य पशु को सौंप कर ,सभी वहां से चले गए, जहां वह शिकारी था, उसके चले जाने पर उनके बच्चे भी उछलते कूदते वहां तक जा पहुंचे,
क्योंकि उन्होंने अपने ठीक ही सोच लिया था कि उनकी जैसी गति होगी वैसी हम लोगों की हो जाएगी, उन को आता शिकारी भी बहुत खुश हुआ
अत: उन्हें मारने के लिए ज्योंही धनुष पर तीर चढ़ाया त्यों हि पूर्व वत कुछ जल और बेलपत्र उस शिवलिंग पर गिर पड़े
जिससे उस रात के चौथे पहर की पूजा अचानक हो गई,इस प्रकार उस शिकारी के सभी पाप क्षण भर में जलकर भस्म हो गए और वह निषाद सब पापों से मुक्त हो गया,
निष्पाप हो गया उस समय उन दोनों मृर्गियों ने और उस मृग से कहा कि है आप कृपा करके हम लोगों के जीवन सार्थक करें सूत जी कहते हैं
कि हे मुनियों इस प्रकार उन मृगो के वचन सुनकर शिकारी ज्ञान का भागी बन गया और अपने मन में सोचने लगा कि यह मृर्गी धन्य है जो ज्ञान हीन पशु होते हुए भी संगठित हैं, अपने शरीर का त्याग करके भी परोपकार कर रहे हैं, खेद की बात है कि मैंने मनुष्य जीवन पाकर भी कौन सा पुण्य कमाया क्योंकि आज तक दूसरे के शरीर को बस देखकर ही तो मैंने अपने शरीर को पाला पोसा, यही नहीं बल्कि अनेकानेक पापू द्वारा अपने परिवार का पालन पोषण किया, हाय जन्म भर में अपने किये वह दुष्कर्म का कैसा कुफल पाऊंगा, इस समय इस प्रकार चिंता करते हुए मेरे इस जीवन को धिक्कार है इस प्रकार सत ज्ञान उत्पन्न होने पर उसके हाथ में अपना बांन एवं धनुष उतारते हुए कहा कि इस मृग तुम धन्य हो अब तुम आनंद पूर्वक अपने स्थान को जाओ सूत जी कहते हैं कि हे मुनियों ब्याध के ऐसा कहने पर शिव जी ने उस पर प्रसन्न होकर उसके द्वारा अनजाने में भी पूजित अपने सर्वमान्य दिव्य स्वरुप का प्रत्यक्ष दर्शन दिया, उस व्याध को अपने हाथों से स्पष्ट करते हुए शिवजी प्रेम पूर्वक बोले कि हे प्रिय निषाद तुम्हारे इस विचित्र शिवरात्रि व्रत पर से मैं अत्यंत प्रसन्न हूं, कोई वर् मांगौ,उस समय वह व्याध भी साक्षात शिव के दर्शन से तत्काल मुक्त हो गया और “मैं सब कुछ पा गया” ऐसा कहते हुए शिवजी के आगे उनके चरणों पर गिर गया,
तब शिवजी ने भी अत्यंत प्रसन्न होकर गुह नाम प्रदान करते हुए ,उसे कृपा दृष्टि से देखते हुए अनेक उत्तम वरदान दिए,शिव जी ने कहा कि है निषादराज सुनो
आज से तुम श्रृंगवेरपुर में जाकर उसे अपनी राजधानी बनाओ और अनेक प्रकार के दिव्य दुर्लभ भोगों का उपयोग करो, देखो हे निषाद, वंश वृद्धि देवताओं द्वारा प्रंशिस्त है
,तुम्हारे घर में किसी समय श्रीराम भी निश्चित ही आएंगे, मेरे भक्तों के साथ स्नेह रखने वाले वह राम आकर तुम्हारे साथ मैत्री करेंगे, और
मेरी सेवा से आसकत चित् वाले तुम अवश्य मुक्ति प्राप्त करोगे ,सूत जी कहते हैं कि है मुनि
इसी बीच श्री शंकर जी का दर्शन करके वह सभी मृग पशु योनि का परित्याग करके मुक्त हो गए
और दिव्य विमान पर बैठकर पूर्व शाप से मुक्त होकर स्वर्ग लोक को चले गए, उधर विष्णु भगवान नारद से कहने लगे – “हे मुने |अर्बुध पर्वत पर शिव जी व्याधेसेवेर नाम से प्रसिद्ध हुए, योग दर्शन मात्र से शिव भक्तों की भक्ति और मुक्ति प्रदान करते हैं
हे मुनीश्वर उस दिन से वह निषाद भी अनेक दिव्य भोगो को भोग कर भगवान राम की अनुकम्पा से संसार से मुक्त हो गया
इस प्रकार अज्ञानता वश भी उसने शिव व्रत के प्रताप से मुक्ति को प्राप्त कर लिया
बोलो भगवान शंकर जी की जय

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